ज़िंदगी बीत जाती है किसी को जानने में,
एक पन्ना उसका पढ़ कुछ ना होगा।
जुबां पर आई बात का क्यों कर भरोसा करें,
जब अल्फ़ाज़ों के बाम से भी कुछ ना होता।।
अपने बारे में कुछ भी लिखने से पहले ये कुछ पंक्तियाँ मन में आईं और मैंने यहाँ लिख दीं। आशय ये की जब ज़ुबान से निकले हुए शब्द भी किसी का दिल हल्का नहीं कर सकते तो किसी के बारे में कुछ पढ़ कर मन नहीं बनाया जाना चाहिए। किसी को भी जानने के लिए ज़रूरी है कि उस व्यक्ति के बारे में यह जाना जाए की वो भौतिक दबाव में, मजबूरी में, बहुत ख़ुशी में, अत्याधिक दुःख में और अपने से दोयम स्तर के लोगों से कैसा बर्ताव करता है। दूसरा पैमाना यह भी हो सकता है कि उस व्यक्ति की हर उपलब्धियों के प्रति उसकी भूमिका देखी जाए।
तो, इस पेज पर आने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। मैं आशा करता हूँ की मेरे बारे में कुछ अच्छा सुन कर ही आप यहाँ तक पहुँचे हैं।
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